भगवान वामन श्री हरि के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए थे 13429329


हमारे वेदों में चार युगों का वर्णन मिलता है। ब्रह्माजी का एक दिन यानी चार वेदों का समय है। यह समय सौर वर्ष ( 12 माह से सौर वर्ष बनता है और सौर वर्ष का प्रथम दिन ‘मेष’ होता है।) में उल्लेखित है। चार युगों में सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग आते हैं।

त्रेतायुग दूसरा युग था जिसमें अधर्म का नाश करने के लिए भगवान विष्णु तीन अवतार लिए थे, जो क्रमशः वामन अवतार, परशुराम अवतार और श्रीराम अवतार के नाम से हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों में उल्लेखित हैं।

त्रेतायुग में भगवान विष्णु के पांचवें अवतार के रूप में वामन अवतार लिया गया था। पहले चार अवतार क्रमशः मत्स्य, कच्छप, वाराह और नृसिंह थे। वामन अवतार में उन्होंने राजा बलि से तीन पग जमीन मांग कर धरती की रक्षा की थी। छठवां अवतार भगवान ने परशुराम का लिया। इसके बाद भगवान श्रीराम के रूप में भगवान विष्णु इस धरती पर जन्मे थे।

वामन अवतार: भगवान वामन श्री हरि के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए थे। उनके पिता वामन ऋषि और माता अदिति थीं। वह बौने ब्राह्मण के रूप में जन्मे थे। वामन भगवान को दक्षिण भारत में उपेन्द्र के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि वह इंद्र के छोटे भाई थे।

भागवत पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने इंद्र का देवलोक में पुनः अधिकार स्थापित करने के लिए यह अवतार लिया। दरअसल देवलोक पर असुर राजा बली ने विजयश्री हासिल कर इसे अपने अधिकार में ले लिया था। राजा बली विरोचन के पुत्र और प्रह्लाद के पौत्र थे।

उन्होने अपने तप और पराक्रम के बल पर देवलोक पर विजयश्री हासिल की थी। राजा बलि महादानी राजा थे, उनके दर से कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। यह बात जब वामन भगवान को पता चली तो वह एक बौने ब्राह्मण के वेष में बली के पास गये और उनसे अपने रहने के लिए तीन पग के बराबर भूमि देने का आग्रह किया। उनके हाथ में एक लकड़ी का छाता था। गुरु शुक्राचार्य के चेताने के बावजूद बली ने वामन को वचन दे डाला। इस तरह भगवान ने दो पग में धरती, आकाश नाम लिया, चौथा पग उन्होंने राजा बलि के सिर पर रखा था। जिसके बाद से राजा बलि को मोक्ष प्राप्त हुआ।

परशुराम अवतार: भगवान विष्ण के छठवें अवतार के रूप में राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र के रूप में जन्में थे। इस अवतार में वह भगवान शिव के परम भक्त थे। इन्हें शिव से विशेष परशु(फरसा) प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था, किन्तु शंकर द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण ये परशुराम कहलाते थे।

श्रीराम अवतार: श्रीहरि ने सातवें अवतार के रूप में श्रीराम के नाम से जन्म लिया। वह अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के पुत्र के रूप में जन्मे थे। इस अवतार में वह मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। उन्होंने लंकापति रावण के अलाव कई दैत्यों का अंत किया। श्रीराम की संपूर्ण गाथा वाल्मीकि रामायण में उल्लेखित है।

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अंधकारमय जीवन (VINAY YADAV)

आज के अखबार में दिल्‍ली सरकार के एक विज्ञापन ने मेरा ध्‍यान खींचा। इसमें कहा गया था: अब दिल्‍ली में एक ईमानदार सरकार है। उत्‍सुकता के साथ मैंने आगे पढ़ा। जैसा कि मेरा अनुमान था, सारी बातें उन चीजों को लेकर थीं जिसे अरविंद केजरीवाल की सरकार दिल्‍ली की जनता के फायदे के लिए मुफ्त में कर रही है। इसके बाद इसमें बताया गया था कि आखिर कैसे यह सरकार जनता को इतनी सुविधाएं देने में सक्षम हो पाई है और इस तरह की योजनाओं के लिए पैसा कहां से आ रहा है।

HONEST GOVT ADVERT MARCH 28 2016
कोई भी कह सकता है कि यह महज राजनीति और प्रशंसा बटोरने का तरीका है। शायद ऐसा हो, लेकिन हर किसी को इस बारे में दिए गए विवरण पर ध्‍यान देना चाहिए और जो बातें कही गईं थीं, उनमें से ज्‍यादातर पर मैं भी सहमत था, और इसके पीछे कारण भी था। विज्ञापन में तीन बातें कही गईं थीं…
1. एक एलिवेटेड रोड को बनाने का अनुमानित खर्च 325 करोड़ रुपए था। सरकार ने 200 करोड़ रुपए में इस काम को पूरा कर लिया और 125 करोड़ रुपए बचा लिए।
2. पहले एक डिस्‍पेंसरी बनाने पर 5 करोड़ रुपए का खर्च आता था। अब 20 लाख रुपए में इसे तैयार कर दिया जाता है।
3. पहले एक आईटीआई को बनाने में 24 करोड़ रुपए का खर्च आता था, अब इसे 16 करोड़ रुपए में बना लिया जाता है और 8 करोड़ रुपए की बचत कर ली जाती है।
आप में से कुछ लोग कह सकते हैं कि इसमें क्या बड़ी बात है, लेकिन राजनीति को दरकिनार कर निष्‍पक्षता से इसे देखिए। खासकर एक ऐसे देश में जहां ज्‍यादा लागत और ज्यादा समय लगना अपवाद की बजाय नियम जैसा बन गया है, तब आप समझेंगे कि मैं क्‍या कहना चाहता हूं। अब यह किसी से छुपा नहीं है कि ज्‍यादातर सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए लागत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना मानक बन गया है। खराबी तो तब और है जब प्रॉजेक्‍ट की लागत जरूरत से ज्‍यादा हो, लेकिन इस पर जो रकम खर्च की जाए, वह जरूरत से भी कम हो। इसलिए एक तरह से यह बहुबाधा वाली स्थिति है।
क्‍या कभी आपने यह सोचा है कि ब्रिटिश शासनकाल में करीब 100 साल पहले जो चीजें बनाई गईं या सैकड़ों साल पहले राजा-महाराजाओं ने जो निर्माण करवाया, वे अभी तक मजबूती से कैसे खडे़ हैं, और हालिया वक्‍त में जो निर्माण करवाया गया उनमें चंद सालों के भीतर दरारें कैसे पड़ गईं? सालों पहले क्‍यों, पता नहीं आप में से कितने लोगों को याद होगा कि साल 2010 के राष्‍ट्रमंडल खेलों से ठीक पहले दिल्‍ली के नेहरू स्‍टेडियम से सटा हुआ इंडोर अरीना बनाया गया था। उद्घाटन समारोह के दौरान ही इसमें लीकेज की समस्‍या हो गई।
लेकिन तब, कोई कैसे 2010 के राष्‍ट्रमंडल खेलों को भूलकर सरकारी योजनाओं में भ्रष्‍टाचार की बात कर सकता है जिसे सामान्‍य तौर पर पिछली केंद्र सरकार के साथ जो भी गलत था, उसके पर्याय के तौर पर देखा जाता है। खेलों में भ्रष्‍टाचार संबंधी मुद्दों पर मैंने काफी कुछ लिखा है, इसमें यह भी शामिल था कि कैसे नई जगहों के निर्माण या फिर पुराने स्‍टेडियमों के पुनर्निर्माण के नाम पर लागत को बढ़ाकर शर्मनाक तरीके से पैसे निकाले गए। शर्मनाक यह है कि यह सब कुछ ‘देशभक्ति’ और ‘राष्‍ट्रीय प्रतिष्‍ठा’ आदि के नाम पर किया गया। मैंने अगस्‍त 2010 में इस पर लिखा भी था। (क्लिक कर पढ़ें…)
एक चीज जो हमेशा सिर उठा सकती है वह है जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम की पुनर्निमाण की लागत। स्टेडियम के रेनोवेशन में 1000 करोड़ रुपए का खर्च आया!! एक स्टेडियम के रेनोवेशन पर इतना खर्च हो सकता है, आपने कभी सोचा था? लेकिन, यह खर्च भी जस्टिफाइ हो गया। सोचिए, अकेले स्टेडियम के रेनोवेशन के जरिए कई लोगों ने कई पीढ़ियों के लिए कमा लिया होगा।
सिर्फ कॉमनवेल्थ खेलों की ही बात क्यों करें? तकरीबन सारे प्रॉजेक्ट्स में, चाहे वह ऐसी निजी सेक्टर परियोजनाएं हों जिनकी फंडिंग में सरकारी एजेंसियां शामिल हैं, परियोजना की लागत जरूरत से कहीं ज्यादा होती है। लेकिन अतिरिक्त पैसा जाता कहां है, यह किसी से छुपा नहीं है।
लिहाजा, ऐसे वक्त में अगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री यह कहता है कि बड़ी परियोजनाओं के लिए आवंटित धनराशि में से पैसा बचाकर जनकल्याण के कार्यों में खर्च किया जा रहा है, तो इसमें गलत क्या है? ईमानदारी से कहूं तो मुझे इसमें मेरिट के सिवाय कुछ नहीं दिखाई दे रहा। बचाया गया पैसा आपका और मेरा है, फिर इस तरह क्यों न किया जाए खर्च!
दरअसल, मैं सभी सरकारों से गुजारिश करूंगा कि वे इस पहलू पर भी गौर करें। किसी न किसी परियोजना की लागत पर बारीकी और गंभीरता से ध्यान दें तो लागत का बड़ा हिस्सा बचाया जा सकता है और फंड का इस्तेमाल अन्य परियोजनाओं पर खर्च किया जा सकता है, समाज कल्याण के लक्ष्य साधे जा सकते हैं।
कुछ बिचौलियों का नुकसान होगा, लेकिन वोटर खुश होगा, समाज को फायदा पहुंचेगा। तो, ऐसा करिए न!

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कोई भी कह सकता है कि यह महज राजनीति और प्रशंसा बटोरने का तरीका है। शायद ऐसा हो, लेकिन हर किसी को इस बारे में दिए गए विवरण पर ध्‍यान देना चाहिए और जो बातें कही गईं थीं, उनमें से ज्‍यादातर पर मैं भी सहमत था, और इसके पीछे कारण भी था। विज्ञापन में तीन बातें कही गईं थीं…
1. एक एलिवेटेड रोड को बनाने का अनुमानित खर्च 325 करोड़ रुपए था। सरकार ने 200 करोड़ रुपए में इस काम को पूरा कर लिया और 125 करोड़ रुपए बचा लिए।
2. पहले एक डिस्‍पेंसरी बनाने पर 5 करोड़ रुपए का खर्च आता था। अब 20 लाख रुपए में इसे तैयार कर दिया जाता है।
3. पहले एक आईटीआई को बनाने में 24 करोड़ रुपए का खर्च आता था, अब इसे 16 करोड़ रुपए में बना लिया जाता है और 8 करोड़ रुपए की बचत कर ली जाती है।
आप में से कुछ लोग कह सकते हैं कि इसमें क्या बड़ी बात है, लेकिन राजनीति को दरकिनार कर निष्‍पक्षता से इसे देखिए। खासकर एक ऐसे देश में जहां ज्‍यादा लागत और ज्यादा समय लगना अपवाद की बजाय नियम जैसा बन गया है, तब आप समझेंगे कि मैं क्‍या कहना चाहता हूं। अब यह किसी से छुपा नहीं है कि ज्‍यादातर सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए लागत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना मानक बन गया है। खराबी तो तब और है जब प्रॉजेक्‍ट की लागत जरूरत से ज्‍यादा हो, लेकिन इस पर जो रकम खर्च की जाए, वह जरूरत से भी कम हो। इसलिए एक तरह से यह बहुबाधा वाली स्थिति है।
क्‍या कभी आपने यह सोचा है कि ब्रिटिश शासनकाल में करीब 100 साल पहले जो चीजें बनाई गईं या सैकड़ों साल पहले राजा-महाराजाओं ने जो निर्माण करवाया, वे अभी तक मजबूती से कैसे खडे़ हैं, और हालिया वक्‍त में जो निर्माण करवाया गया उनमें चंद सालों के भीतर दरारें कैसे पड़ गईं? सालों पहले क्‍यों, पता नहीं आप में से कितने लोगों को याद होगा कि साल 2010 के राष्‍ट्रमंडल खेलों से ठीक पहले दिल्‍ली के नेहरू स्‍टेडियम से सटा हुआ इंडोर अरीना बनाया गया था। उद्घाटन समारोह के दौरान ही इसमें लीकेज की समस्‍या हो गई।
लेकिन तब, कोई कैसे 2010 के राष्‍ट्रमंडल खेलों को भूलकर सरकारी योजनाओं में भ्रष्‍टाचार की बात कर सकता है जिसे सामान्‍य तौर पर पिछली केंद्र सरकार के साथ जो भी गलत था, उसके पर्याय के तौर पर देखा जाता है। खेलों में भ्रष्‍टाचार संबंधी मुद्दों पर मैंने काफी कुछ लिखा है, इसमें यह भी शामिल था कि कैसे नई जगहों के निर्माण या फिर पुराने स्‍टेडियमों के पुनर्निर्माण के नाम पर लागत को बढ़ाकर शर्मनाक तरीके से पैसे निकाले गए। शर्मनाक यह है कि यह सब कुछ ‘देशभक्ति’ और ‘राष्‍ट्रीय प्रतिष्‍ठा’ आदि के नाम पर किया गया। मैंने अगस्‍त 2010 में इस पर लिखा भी था। (क्लिक कर पढ़ें…)
एक चीज जो हमेशा सिर उठा सकती है वह है जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम की पुनर्निमाण की लागत। स्टेडियम के रेनोवेशन में 1000 करोड़ रुपए का खर्च आया!! एक स्टेडियम के रेनोवेशन पर इतना खर्च हो सकता है, आपने कभी सोचा था? लेकिन, यह खर्च भी जस्टिफाइ हो गया। सोचिए, अकेले स्टेडियम के रेनोवेशन के जरिए कई लोगों ने कई पीढ़ियों के लिए कमा लिया होगा।
सिर्फ कॉमनवेल्थ खेलों की ही बात क्यों करें? तकरीबन सारे प्रॉजेक्ट्स में, चाहे वह ऐसी निजी सेक्टर परियोजनाएं हों जिनकी फंडिंग में सरकारी एजेंसियां शामिल हैं, परियोजना की लागत जरूरत से कहीं ज्यादा होती है। लेकिन अतिरिक्त पैसा जाता कहां है, यह किसी से छुपा नहीं है।
लिहाजा, ऐसे वक्त में अगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री यह कहता है कि बड़ी परियोजनाओं के लिए आवंटित धनराशि में से पैसा बचाकर जनकल्याण के कार्यों में खर्च किया जा रहा है, तो इसमें गलत क्या है? ईमानदारी से कहूं तो मुझे इसमें मेरिट के सिवाय कुछ नहीं दिखाई दे रहा। बचाया गया पैसा आपका और मेरा है, फिर इस तरह क्यों न किया जाए खर्च!
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कुछ बिचौलियों का नुकसान होगा, लेकिन वोटर खुश होगा, समाज को फायदा पहुंचेगा। तो, ऐसा करिए न!

Great Pm of india

खत्म होगा सूखे का संकट! मोदी लेकर आए बड़ी योजना, भाजपा ने चला बड़ा दांव
April 23, 2016 1 3217

चुनावी साल में गर्माई उत्तर प्रदेश की राजनीति के बीच ‘सूखा’ बुंदेलखंड एक बार फिर केंद्र बिंदु में आ गया है। मोदी सरकार की चिंता में बुंदेलखंड किस कदर शामिल है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पीएम नरेंद्र मोदी खुद ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (पीएमकेएसवाई) की शुरुआत बुंदेलखंड से करने जा रहे हैं। हालांकि, योजना की लांचिंग की तारीख फिलहॉल तय नहीं हुई है।

पहले अतिवृष्टि और फिर सूखे ने बुंदेलखंड के किसानों को दोहरी मार दी है। एक ओर किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं, वहीं पलायन भी थमने का नाम नहीं ले रहा। हॉलात ऐसे हैं कि गांव के गांव सूने पड़े हैं। ऐसे माहौल में भाजपा ने भी किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने का बड़ा राजनीतिक दांव चला है।

मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार बुंदेलखंड की धरती से पीएमकेएसवाई की शुरुआत करने जा रही है। योजना की लांचिंग भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों होगी। पूरी संभावना है कि योजना की शुरुआत बुंदेलखंड के केंद्र झांसी से हो। जल्द ही इसकी तिथि व स्थान की घोषणा हो सकती है।

मालूम हो कि देश में कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से 65 प्रतिशत में सिंचाई की सुविधा नहीं है। इस योजना का मकसद यह है कि सूखे खेतों में भी फसलें लहलहाएं। इस लिहाज से यह योजना महत्वपूर्ण है। पीएमकेएसवाई को पांच सालों के लिए 50 हजार करोड़ रुपये राशि का प्रावधान किया गया है।

यह है प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना
– देश भर में सिंचाई में निवेश में एकरूपता लाना
– ‘हर खेत को पानी’ के तहत कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार करना
– खेतों में पानी के इस्तेमाल की दक्षता बढ़ाना
– पानी का अपव्यय कम करना, पानी की हर बूंद का इस्तेमाल
– फसल उत्पादन क्षमता बढ़ाकर किसानों का जीवनस्तर सुधारना
प्रधानमंत्री बुंदेलखंड की दुर्दशा से अच्छी तरह वाकिफ हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान बरेली की रैली में मोदी ने कहा था कि बुंदेलखंड में केन, बेतवा, यमुना, पहुज, मंदाकिनी जैसी नदियां बहने के बावजूद यह क्षेत्र भीषण सूखे की चपेट में है। पीएमकेएसवाई के जरिये मोदी चाहते हैं कि सूखी नहरों में भी लबालब पानी भरा हो और इनके पानी से सूखे खेतों में हरियाली लहलहाए। ताकि, किसानों की हॉलत सुधरे और उनका पलायन रुक सके।

जल्द शुरू होगी केन-बेतवा नदी परियोजना
पीएमकेएसवाई के तहत केंद्र सरकार नदियों के जरिए बुंदेलखंड की नहरों का विकास करना चाहती है। इसके लिए रुकी हुई केन-बेतवा नदी परियोजना की जल्द शुरूआत होगी। बरुआसागर के तालाब को केंद्र बनाया गया है। योजना के पीछे सोच यह है कि बारिश का पानी संरक्षित किया जाए और इस पानी का उपयोग खेतों की सिंचाई में हो सके।

‘पीएमकेएसवाई के संबंध में कृषि विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों को मई के पहले सप्ताह से प्रशिक्षण दिया जाना है लेकिन खुद प्रधानमंत्री यहां से इसकी शुरुआत करेंगे, इसकी कोई औपचारिक जानकारी अभी नहीं मिली है।’
– अजय कुमार शुक्ला, जिलाधिकारी, झांसी

‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुंदेलखंड से योजना की शुरुआत करने पर सहमति जता दी है। हालांकि अभी योजना की लांचिंग की तिथि निर्धारित नहीं है। बुंदेलखंड के लिए यह प्रधानमंत्री की बड़ी सौगात होगी।’
– रत्नाकर पांडेय, क्षेत्रीय संगठन मंत्री