अंधकारमय जीवन (VINAY YADAV)

आज के अखबार में दिल्‍ली सरकार के एक विज्ञापन ने मेरा ध्‍यान खींचा। इसमें कहा गया था: अब दिल्‍ली में एक ईमानदार सरकार है। उत्‍सुकता के साथ मैंने आगे पढ़ा। जैसा कि मेरा अनुमान था, सारी बातें उन चीजों को लेकर थीं जिसे अरविंद केजरीवाल की सरकार दिल्‍ली की जनता के फायदे के लिए मुफ्त में कर रही है। इसके बाद इसमें बताया गया था कि आखिर कैसे यह सरकार जनता को इतनी सुविधाएं देने में सक्षम हो पाई है और इस तरह की योजनाओं के लिए पैसा कहां से आ रहा है।

HONEST GOVT ADVERT MARCH 28 2016
कोई भी कह सकता है कि यह महज राजनीति और प्रशंसा बटोरने का तरीका है। शायद ऐसा हो, लेकिन हर किसी को इस बारे में दिए गए विवरण पर ध्‍यान देना चाहिए और जो बातें कही गईं थीं, उनमें से ज्‍यादातर पर मैं भी सहमत था, और इसके पीछे कारण भी था। विज्ञापन में तीन बातें कही गईं थीं…
1. एक एलिवेटेड रोड को बनाने का अनुमानित खर्च 325 करोड़ रुपए था। सरकार ने 200 करोड़ रुपए में इस काम को पूरा कर लिया और 125 करोड़ रुपए बचा लिए।
2. पहले एक डिस्‍पेंसरी बनाने पर 5 करोड़ रुपए का खर्च आता था। अब 20 लाख रुपए में इसे तैयार कर दिया जाता है।
3. पहले एक आईटीआई को बनाने में 24 करोड़ रुपए का खर्च आता था, अब इसे 16 करोड़ रुपए में बना लिया जाता है और 8 करोड़ रुपए की बचत कर ली जाती है।
आप में से कुछ लोग कह सकते हैं कि इसमें क्या बड़ी बात है, लेकिन राजनीति को दरकिनार कर निष्‍पक्षता से इसे देखिए। खासकर एक ऐसे देश में जहां ज्‍यादा लागत और ज्यादा समय लगना अपवाद की बजाय नियम जैसा बन गया है, तब आप समझेंगे कि मैं क्‍या कहना चाहता हूं। अब यह किसी से छुपा नहीं है कि ज्‍यादातर सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए लागत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना मानक बन गया है। खराबी तो तब और है जब प्रॉजेक्‍ट की लागत जरूरत से ज्‍यादा हो, लेकिन इस पर जो रकम खर्च की जाए, वह जरूरत से भी कम हो। इसलिए एक तरह से यह बहुबाधा वाली स्थिति है।
क्‍या कभी आपने यह सोचा है कि ब्रिटिश शासनकाल में करीब 100 साल पहले जो चीजें बनाई गईं या सैकड़ों साल पहले राजा-महाराजाओं ने जो निर्माण करवाया, वे अभी तक मजबूती से कैसे खडे़ हैं, और हालिया वक्‍त में जो निर्माण करवाया गया उनमें चंद सालों के भीतर दरारें कैसे पड़ गईं? सालों पहले क्‍यों, पता नहीं आप में से कितने लोगों को याद होगा कि साल 2010 के राष्‍ट्रमंडल खेलों से ठीक पहले दिल्‍ली के नेहरू स्‍टेडियम से सटा हुआ इंडोर अरीना बनाया गया था। उद्घाटन समारोह के दौरान ही इसमें लीकेज की समस्‍या हो गई।
लेकिन तब, कोई कैसे 2010 के राष्‍ट्रमंडल खेलों को भूलकर सरकारी योजनाओं में भ्रष्‍टाचार की बात कर सकता है जिसे सामान्‍य तौर पर पिछली केंद्र सरकार के साथ जो भी गलत था, उसके पर्याय के तौर पर देखा जाता है। खेलों में भ्रष्‍टाचार संबंधी मुद्दों पर मैंने काफी कुछ लिखा है, इसमें यह भी शामिल था कि कैसे नई जगहों के निर्माण या फिर पुराने स्‍टेडियमों के पुनर्निर्माण के नाम पर लागत को बढ़ाकर शर्मनाक तरीके से पैसे निकाले गए। शर्मनाक यह है कि यह सब कुछ ‘देशभक्ति’ और ‘राष्‍ट्रीय प्रतिष्‍ठा’ आदि के नाम पर किया गया। मैंने अगस्‍त 2010 में इस पर लिखा भी था। (क्लिक कर पढ़ें…)
एक चीज जो हमेशा सिर उठा सकती है वह है जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम की पुनर्निमाण की लागत। स्टेडियम के रेनोवेशन में 1000 करोड़ रुपए का खर्च आया!! एक स्टेडियम के रेनोवेशन पर इतना खर्च हो सकता है, आपने कभी सोचा था? लेकिन, यह खर्च भी जस्टिफाइ हो गया। सोचिए, अकेले स्टेडियम के रेनोवेशन के जरिए कई लोगों ने कई पीढ़ियों के लिए कमा लिया होगा।
सिर्फ कॉमनवेल्थ खेलों की ही बात क्यों करें? तकरीबन सारे प्रॉजेक्ट्स में, चाहे वह ऐसी निजी सेक्टर परियोजनाएं हों जिनकी फंडिंग में सरकारी एजेंसियां शामिल हैं, परियोजना की लागत जरूरत से कहीं ज्यादा होती है। लेकिन अतिरिक्त पैसा जाता कहां है, यह किसी से छुपा नहीं है।
लिहाजा, ऐसे वक्त में अगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री यह कहता है कि बड़ी परियोजनाओं के लिए आवंटित धनराशि में से पैसा बचाकर जनकल्याण के कार्यों में खर्च किया जा रहा है, तो इसमें गलत क्या है? ईमानदारी से कहूं तो मुझे इसमें मेरिट के सिवाय कुछ नहीं दिखाई दे रहा। बचाया गया पैसा आपका और मेरा है, फिर इस तरह क्यों न किया जाए खर्च!
दरअसल, मैं सभी सरकारों से गुजारिश करूंगा कि वे इस पहलू पर भी गौर करें। किसी न किसी परियोजना की लागत पर बारीकी और गंभीरता से ध्यान दें तो लागत का बड़ा हिस्सा बचाया जा सकता है और फंड का इस्तेमाल अन्य परियोजनाओं पर खर्च किया जा सकता है, समाज कल्याण के लक्ष्य साधे जा सकते हैं।
कुछ बिचौलियों का नुकसान होगा, लेकिन वोटर खुश होगा, समाज को फायदा पहुंचेगा। तो, ऐसा करिए न!

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अंधकारमय जीवन (VINAY YADAV)

आज के अखबार में दिल्‍ली सरकार के एक विज्ञापन ने मेरा ध्‍यान खींचा। इसमें कहा गया था: अब दिल्‍ली में एक ईमानदार सरकार है। उत्‍सुकता के साथ मैंने आगे पढ़ा। जैसा कि मेरा अनुमान था, सारी बातें उन चीजों को लेकर थीं जिसे अरविंद केजरीवाल की सरकार दिल्‍ली की जनता के फायदे के लिए मुफ्त में कर रही है। इसके बाद इसमें बताया गया था कि आखिर कैसे यह सरकार जनता को इतनी सुविधाएं देने में सक्षम हो पाई है और इस तरह की योजनाओं के लिए पैसा कहां से आ रहा है।

HONEST GOVT ADVERT MARCH 28 2016
कोई भी कह सकता है कि यह महज राजनीति और प्रशंसा बटोरने का तरीका है। शायद ऐसा हो, लेकिन हर किसी को इस बारे में दिए गए विवरण पर ध्‍यान देना चाहिए और जो बातें कही गईं थीं, उनमें से ज्‍यादातर पर मैं भी सहमत था, और इसके पीछे कारण भी था। विज्ञापन में तीन बातें कही गईं थीं…
1. एक एलिवेटेड रोड को बनाने का अनुमानित खर्च 325 करोड़ रुपए था। सरकार ने 200 करोड़ रुपए में इस काम को पूरा कर लिया और 125 करोड़ रुपए बचा लिए।
2. पहले एक डिस्‍पेंसरी बनाने पर 5 करोड़ रुपए का खर्च आता था। अब 20 लाख रुपए में इसे तैयार कर दिया जाता है।
3. पहले एक आईटीआई को बनाने में 24 करोड़ रुपए का खर्च आता था, अब इसे 16 करोड़ रुपए में बना लिया जाता है और 8 करोड़ रुपए की बचत कर ली जाती है।
आप में से कुछ लोग कह सकते हैं कि इसमें क्या बड़ी बात है, लेकिन राजनीति को दरकिनार कर निष्‍पक्षता से इसे देखिए। खासकर एक ऐसे देश में जहां ज्‍यादा लागत और ज्यादा समय लगना अपवाद की बजाय नियम जैसा बन गया है, तब आप समझेंगे कि मैं क्‍या कहना चाहता हूं। अब यह किसी से छुपा नहीं है कि ज्‍यादातर सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए लागत को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना मानक बन गया है। खराबी तो तब और है जब प्रॉजेक्‍ट की लागत जरूरत से ज्‍यादा हो, लेकिन इस पर जो रकम खर्च की जाए, वह जरूरत से भी कम हो। इसलिए एक तरह से यह बहुबाधा वाली स्थिति है।
क्‍या कभी आपने यह सोचा है कि ब्रिटिश शासनकाल में करीब 100 साल पहले जो चीजें बनाई गईं या सैकड़ों साल पहले राजा-महाराजाओं ने जो निर्माण करवाया, वे अभी तक मजबूती से कैसे खडे़ हैं, और हालिया वक्‍त में जो निर्माण करवाया गया उनमें चंद सालों के भीतर दरारें कैसे पड़ गईं? सालों पहले क्‍यों, पता नहीं आप में से कितने लोगों को याद होगा कि साल 2010 के राष्‍ट्रमंडल खेलों से ठीक पहले दिल्‍ली के नेहरू स्‍टेडियम से सटा हुआ इंडोर अरीना बनाया गया था। उद्घाटन समारोह के दौरान ही इसमें लीकेज की समस्‍या हो गई।
लेकिन तब, कोई कैसे 2010 के राष्‍ट्रमंडल खेलों को भूलकर सरकारी योजनाओं में भ्रष्‍टाचार की बात कर सकता है जिसे सामान्‍य तौर पर पिछली केंद्र सरकार के साथ जो भी गलत था, उसके पर्याय के तौर पर देखा जाता है। खेलों में भ्रष्‍टाचार संबंधी मुद्दों पर मैंने काफी कुछ लिखा है, इसमें यह भी शामिल था कि कैसे नई जगहों के निर्माण या फिर पुराने स्‍टेडियमों के पुनर्निर्माण के नाम पर लागत को बढ़ाकर शर्मनाक तरीके से पैसे निकाले गए। शर्मनाक यह है कि यह सब कुछ ‘देशभक्ति’ और ‘राष्‍ट्रीय प्रतिष्‍ठा’ आदि के नाम पर किया गया। मैंने अगस्‍त 2010 में इस पर लिखा भी था। (क्लिक कर पढ़ें…)
एक चीज जो हमेशा सिर उठा सकती है वह है जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम की पुनर्निमाण की लागत। स्टेडियम के रेनोवेशन में 1000 करोड़ रुपए का खर्च आया!! एक स्टेडियम के रेनोवेशन पर इतना खर्च हो सकता है, आपने कभी सोचा था? लेकिन, यह खर्च भी जस्टिफाइ हो गया। सोचिए, अकेले स्टेडियम के रेनोवेशन के जरिए कई लोगों ने कई पीढ़ियों के लिए कमा लिया होगा।
सिर्फ कॉमनवेल्थ खेलों की ही बात क्यों करें? तकरीबन सारे प्रॉजेक्ट्स में, चाहे वह ऐसी निजी सेक्टर परियोजनाएं हों जिनकी फंडिंग में सरकारी एजेंसियां शामिल हैं, परियोजना की लागत जरूरत से कहीं ज्यादा होती है। लेकिन अतिरिक्त पैसा जाता कहां है, यह किसी से छुपा नहीं है।
लिहाजा, ऐसे वक्त में अगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री यह कहता है कि बड़ी परियोजनाओं के लिए आवंटित धनराशि में से पैसा बचाकर जनकल्याण के कार्यों में खर्च किया जा रहा है, तो इसमें गलत क्या है? ईमानदारी से कहूं तो मुझे इसमें मेरिट के सिवाय कुछ नहीं दिखाई दे रहा। बचाया गया पैसा आपका और मेरा है, फिर इस तरह क्यों न किया जाए खर्च!
दरअसल, मैं सभी सरकारों से गुजारिश करूंगा कि वे इस पहलू पर भी गौर करें। किसी न किसी परियोजना की लागत पर बारीकी और गंभीरता से ध्यान दें तो लागत का बड़ा हिस्सा बचाया जा सकता है और फंड का इस्तेमाल अन्य परियोजनाओं पर खर्च किया जा सकता है, समाज कल्याण के लक्ष्य साधे जा सकते हैं।
कुछ बिचौलियों का नुकसान होगा, लेकिन वोटर खुश होगा, समाज को फायदा पहुंचेगा। तो, ऐसा करिए न!

विनय यादव की बेईमानी

ईमान जैसे प्रदूषित वायु की तरह फैल रहा है दिल्ली और दूसरे शहरों की हवाओं में, कइयों की जान को खतरा हो लिया है। मेरी जान कल जाते-जाते बची। मैं कल गया ट्रांसपोर्ट लाइसेंस के दफ्तर में, बाइक का लाइसेंस बनवाना था। बाबू ने मुझसे पूछा- श्रीमान आप कैसे हैं। 10 मिनट में आप आवश्यक परीक्षाएं दें और आपको आपका लाइसेंस बिना रिश्वत दे दिया जाएगा।
मैं बेहोश हो गया। सह-लाइसेंसार्थियों ने डॉक्टर के पास पहुंचाया। डॉक्टर ने मेरे परिजनों को बताया- ईमान का अटैक हो गया है इन दिनों। दिल्ली में ईमान महामारी आ गई है। पानी के दफ्तर से सौ लोग बेहोश होकर आए, जब उन्हें बताया गया कि पानी के मीटर में हेर-फेर करने की गुजारिश ना करें, हम रिश्वत लेकर मीटर में हेराफेरी नहीं करेंगे। आप मुफ्त पानी यूज करें। ये सुन लोग बेहोश हो गए।
बिजली दफ्तर से हजार लोग सदमे में आकर अस्पताल में दाखिल हुए, जब उन्हें बताया गया कि उनका बिजली का बिल पचास प्रतिशत कम हो गया है। अकस्मात ये बात झेल ना पाए वो और दिल झटका खा गया। सरकारी अस्पतालों में तो चार बंदे बेड पर ही चल बसे हार्ट अटैक से- जब ये सुना उन्होंने कि दवाएं अस्पताल से ही दी जाएंगी। बेड की चादर रोज बदली जाएगी। दवाएं अस्पताल के भ्रष्ट अफसर ना खा जाएंगे, मरीज खाएंगे। ये झटका भारी पड़ा, चार मरीजों का हार्ट फेल हो गया।
मेरा सुझाव है कि ईमान-झेलीकरण प्रक्रिया शुरू हो। पहले बिजली, पानी के दफ्तरों में रिश्वत के रेट धीमे-धीमे कम किए जाएं। यह सुनिश्चित हो कि सरकारी दफ्तरों में कर्मचारी बदतमीजी से ही बातें करेंगे, ओके गालियों का स्तर कम कर सकते हैं पर एकदम विनम्र ना बन जाएं। अस्पतालों में मरीजों से सीधे ना कहा जाए कि उन्हें दवाएं अस्पतालों से मुफ्त मिलेंगी। मरीजों के तीमारदारों को बता दिया जाए कि दवा मुफ्त है, मरीजों का ना बताया जाए। चलूं, एक सेमिनार में जाना है। विषय वही है- ईमान झेलीकरण प्रक्रिया।

देश को गर्त में मत भेजो( विनय यादव )

किसी ने सच ही कहा है कि सत्ता का नशा हर तरह के नियम, कायदे और कानून भुला देता है। कुछ ऐसा ही हाल वर्तमान समय में भारत के नेताओं का हो चुका है। देश की राजधानी में जब हमारे ‘माननीय’ ही नियमों को तोड़ने से परहेज नहीं करते तो एक सामान्य व्यक्ति से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह नियमों का पालन करेगा? कल कुछ सांसदों ने ऑड-ईवन नियम तोड़ा। किसी ने नियम तोड़कर माफी मांगी तो किसी ने दिल्ली के सीएम केजरीवाल को मनोरोगी की संज्ञा दे दी। क्या राजनीति ऐसी होनी चाहिए? क्या अपनी विपक्षी पार्टी को नीचा दिखाने का यही तरीका होना चाहिए? क्या देश और समाज हित में कोई प्रयोग किया जा रहा है तो उस प्रयोग का समर्थन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर नहीं किया जाना चाहिए?
दिल्ली प्रदेश में बीजेपी, आज विपक्ष की पार्टी है। विपक्ष का काम सत्ता का विरोध करना नहीं होता है बल्कि विपक्ष का काम सत्ता को समाज हित में नए रास्ते दिखाने का होता है। विपक्ष का काम सत्ता को गिराने का नहीं होता बल्कि विपक्ष का काम होता है कि जब सत्ता लड़खड़ाए, तो विपक्ष उसे एक नया विकल्प दे। पीएम नरेन्द्र मोदी ने जनधन योजना के रूप में इसी प्रकार का एक प्रयोग किया था, वह प्रयोग सफल भी माना जा सकता है। लेकिन एक बार कल्पना करिए कि यदि 31 प्रतिशत वोट पाकर सरकार में आई एनडीए की सभी योजनाओं-परियोजनाओं का विरोध अन्य सभी विपक्षी पार्टियां करने लगें तो क्या ये योजनाएं सफल होंगी। दिल्ली में ऑड-ईवन एक प्रयोग है, हो सकता है कि इससे कोई खास फर्क न पड़े, लेकिन क्या इस परिकल्पना के चलते इस प्रयोग को किया ही न जाए! जब कई देशों में इस नियम के सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले हों तब मात्र अहंकारवश दलगत राजनीति से प्रेरित होकर नियमों का उल्लंघन करना बीजेपी जैसी पार्टियों को शोभा नहीं देता।

ऑड-ईवन का विरोध कर नियम तोड़ते बीजेपी के विजय गोयल।

देश के प्रधान ने जब लोकसभा में कहा, ‘हम (सरकार) चाहते हैं कि विपक्ष हमारे साथ मिलकर काम करे।’ तो मुझे लगा कि चलो कोई तो है जो पक्ष-विपक्ष के सामंजस्य के साथ कुछ अच्छा करना चाहता है। लेकिन यही अपेक्षा एक विपक्ष के रूप में इस देश को बीजेपी से भी है। संभव है कि नियम तोड़ने वाले हमारे ‘माननीयों’ को ऑड-ईवन के विषय में जानकारी ना हो और वे गलती से गलत नंबर वाली गाड़ी ले आए हों लेकिन क्या नैशनल मीडिया पर छाए रहने वाले एक विषय के बारे में सांसदों को जानकारी न होना, उचित है? कितना अच्छा होता यदि हमारे पीएम साहब कम से कम एनडीए सांसदों को ऑड-ईवन का पालन करने के लिए सार्वजनिक रूप से कहते।
बीजेपी के दृष्टिकोण से केजरीवाल में लाख बुराइयां होंगी लेकिन इस देश के राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि कोई भी सरकार जब कोई नियम अथवा योजना लाती है, तो समाज हित के लिए ही लाती है। दिल्ली की जनता ने ऑड-ईवन को स्वीकार किया है ऐसे में किसी के द्वारा भी बिना किसी आधार के इसका विरोध करना राजनीति के निम्नतम स्तर को दर्शाता है। अच्छे उद्देश्य के साथ किए जा रहे प्रयोग पर देश के सभी दल एक होकर काम करें तभी ‘भारत माता’ की जय होगी। किसी से जबरदस्ती एक नारा लगवाकर मां भारती की ‘जय’ नहीं हो सकती।
एक सकारात्मक प्रयोग पर सभी का समर्थन मिलना, एक नई तरह की राजनीति का जन्म होगा। सत्ता, समाज कार्य का साधन है, यदि उसे साध्य मान लिया जाएगा तो निश्चित ही समाज हित नहीं हो सकता। साध्य तो समाज हित ही होना चाहिए। देश की राजनीति में परिवर्तन परम आवश्यक है। देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक सिंहासन पर बैठने वाले व्यक्ति का दायित्व है कि वह इस राजनीति में परिवर्तन के लिए नींव पूजन करे। नए प्रयोग में नुकसान हो सकते हैं लेकिन उन नुकसानों के डर के चलते यदि प्रयोग न किए गए तो देश की हालत बद से बदतर हो जाएगी और भविष्य इसके लिए सभी नकारात्मक प्रवृत्ति वाले, दलगत राजनीति से प्रेरित नेताओं को ही अपराधी मानेगा।

Great PM of INDIA

खत्म होगा सूखे का संकट! मोदी लेकर आए बड़ी योजना, भाजपा ने चला बड़ा दांव
April 23, 2016 1 3229

चुनावी साल में गर्माई उत्तर प्रदेश की राजनीति के बीच ‘सूखा’ बुंदेलखंड एक बार फिर केंद्र बिंदु में आ गया है। मोदी सरकार की चिंता में बुंदेलखंड किस कदर शामिल है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पीएम नरेंद्र मोदी खुद ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (पीएमकेएसवाई) की शुरुआत बुंदेलखंड से करने जा रहे हैं। हालांकि, योजना की लांचिंग की तारीख फिलहॉल तय नहीं हुई है।

पहले अतिवृष्टि और फिर सूखे ने बुंदेलखंड के किसानों को दोहरी मार दी है। एक ओर किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं, वहीं पलायन भी थमने का नाम नहीं ले रहा। हॉलात ऐसे हैं कि गांव के गांव सूने पड़े हैं। ऐसे माहौल में भाजपा ने भी किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने का बड़ा राजनीतिक दांव चला है।

मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार बुंदेलखंड की धरती से पीएमकेएसवाई की शुरुआत करने जा रही है। योजना की लांचिंग भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों होगी। पूरी संभावना है कि योजना की शुरुआत बुंदेलखंड के केंद्र झांसी से हो। जल्द ही इसकी तिथि व स्थान की घोषणा हो सकती है।

मालूम हो कि देश में कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से 65 प्रतिशत में सिंचाई की सुविधा नहीं है। इस योजना का मकसद यह है कि सूखे खेतों में भी फसलें लहलहाएं। इस लिहाज से यह योजना महत्वपूर्ण है। पीएमकेएसवाई को पांच सालों के लिए 50 हजार करोड़ रुपये राशि का प्रावधान किया गया है।

यह है प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना
– देश भर में सिंचाई में निवेश में एकरूपता लाना
– ‘हर खेत को पानी’ के तहत कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार करना
– खेतों में पानी के इस्तेमाल की दक्षता बढ़ाना
– पानी का अपव्यय कम करना, पानी की हर बूंद का इस्तेमाल
– फसल उत्पादन क्षमता बढ़ाकर किसानों का जीवनस्तर सुधारना
प्रधानमंत्री बुंदेलखंड की दुर्दशा से अच्छी तरह वाकिफ हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान बरेली की रैली में मोदी ने कहा था कि बुंदेलखंड में केन, बेतवा, यमुना, पहुज, मंदाकिनी जैसी नदियां बहने के बावजूद यह क्षेत्र भीषण सूखे की चपेट में है। पीएमकेएसवाई के जरिये मोदी चाहते हैं कि सूखी नहरों में भी लबालब पानी भरा हो और इनके पानी से सूखे खेतों में हरियाली लहलहाए। ताकि, किसानों की हॉलत सुधरे और उनका पलायन रुक सके।

जल्द शुरू होगी केन-बेतवा नदी परियोजना
पीएमकेएसवाई के तहत केंद्र सरकार नदियों के जरिए बुंदेलखंड की नहरों का विकास करना चाहती है। इसके लिए रुकी हुई केन-बेतवा नदी परियोजना की जल्द शुरूआत होगी। बरुआसागर के तालाब को केंद्र बनाया गया है। योजना के पीछे सोच यह है कि बारिश का पानी संरक्षित किया जाए और इस पानी का उपयोग खेतों की सिंचाई में हो सके।

‘पीएमकेएसवाई के संबंध में कृषि विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों को मई के पहले सप्ताह से प्रशिक्षण दिया जाना है लेकिन खुद प्रधानमंत्री यहां से इसकी शुरुआत करेंगे, इसकी कोई औपचारिक जानकारी अभी नहीं मिली है।’
– अजय कुमार शुक्ला, जिलाधिकारी, झांसी

‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुंदेलखंड से योजना की शुरुआत करने पर सहमति जता दी है। हालांकि अभी योजना की लांचिंग की तिथि निर्धारित नहीं है। बुंदेलखंड के लिए यह प्रधानमंत्री की बड़ी सौगात होगी।’
– रत्नाकर पांडेय, क्षेत्रीय संगठन मंत्री

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खत्म होगा सूखे का संकट! मोदी लेकर आए बड़ी योजना, भाजपा ने चला बड़ा दांव
April 23, 2016 1 3217

चुनावी साल में गर्माई उत्तर प्रदेश की राजनीति के बीच ‘सूखा’ बुंदेलखंड एक बार फिर केंद्र बिंदु में आ गया है। मोदी सरकार की चिंता में बुंदेलखंड किस कदर शामिल है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पीएम नरेंद्र मोदी खुद ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (पीएमकेएसवाई) की शुरुआत बुंदेलखंड से करने जा रहे हैं। हालांकि, योजना की लांचिंग की तारीख फिलहॉल तय नहीं हुई है।

पहले अतिवृष्टि और फिर सूखे ने बुंदेलखंड के किसानों को दोहरी मार दी है। एक ओर किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं, वहीं पलायन भी थमने का नाम नहीं ले रहा। हॉलात ऐसे हैं कि गांव के गांव सूने पड़े हैं। ऐसे माहौल में भाजपा ने भी किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने का बड़ा राजनीतिक दांव चला है।

मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार बुंदेलखंड की धरती से पीएमकेएसवाई की शुरुआत करने जा रही है। योजना की लांचिंग भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों होगी। पूरी संभावना है कि योजना की शुरुआत बुंदेलखंड के केंद्र झांसी से हो। जल्द ही इसकी तिथि व स्थान की घोषणा हो सकती है।

मालूम हो कि देश में कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से 65 प्रतिशत में सिंचाई की सुविधा नहीं है। इस योजना का मकसद यह है कि सूखे खेतों में भी फसलें लहलहाएं। इस लिहाज से यह योजना महत्वपूर्ण है। पीएमकेएसवाई को पांच सालों के लिए 50 हजार करोड़ रुपये राशि का प्रावधान किया गया है।

यह है प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना
– देश भर में सिंचाई में निवेश में एकरूपता लाना
– ‘हर खेत को पानी’ के तहत कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार करना
– खेतों में पानी के इस्तेमाल की दक्षता बढ़ाना
– पानी का अपव्यय कम करना, पानी की हर बूंद का इस्तेमाल
– फसल उत्पादन क्षमता बढ़ाकर किसानों का जीवनस्तर सुधारना
प्रधानमंत्री बुंदेलखंड की दुर्दशा से अच्छी तरह वाकिफ हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान बरेली की रैली में मोदी ने कहा था कि बुंदेलखंड में केन, बेतवा, यमुना, पहुज, मंदाकिनी जैसी नदियां बहने के बावजूद यह क्षेत्र भीषण सूखे की चपेट में है। पीएमकेएसवाई के जरिये मोदी चाहते हैं कि सूखी नहरों में भी लबालब पानी भरा हो और इनके पानी से सूखे खेतों में हरियाली लहलहाए। ताकि, किसानों की हॉलत सुधरे और उनका पलायन रुक सके।

जल्द शुरू होगी केन-बेतवा नदी परियोजना
पीएमकेएसवाई के तहत केंद्र सरकार नदियों के जरिए बुंदेलखंड की नहरों का विकास करना चाहती है। इसके लिए रुकी हुई केन-बेतवा नदी परियोजना की जल्द शुरूआत होगी। बरुआसागर के तालाब को केंद्र बनाया गया है। योजना के पीछे सोच यह है कि बारिश का पानी संरक्षित किया जाए और इस पानी का उपयोग खेतों की सिंचाई में हो सके।

‘पीएमकेएसवाई के संबंध में कृषि विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों को मई के पहले सप्ताह से प्रशिक्षण दिया जाना है लेकिन खुद प्रधानमंत्री यहां से इसकी शुरुआत करेंगे, इसकी कोई औपचारिक जानकारी अभी नहीं मिली है।’
– अजय कुमार शुक्ला, जिलाधिकारी, झांसी

‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुंदेलखंड से योजना की शुरुआत करने पर सहमति जता दी है। हालांकि अभी योजना की लांचिंग की तिथि निर्धारित नहीं है। बुंदेलखंड के लिए यह प्रधानमंत्री की बड़ी सौगात होगी।’
– रत्नाकर पांडेय, क्षेत्रीय संगठन मंत्री

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Mahendra Singh Dhoni or what we usually call him ‘Mahi’ was born on July 7 1981 in Ranchi, Bihar (now part of Jharkhand). His father Pan Singh and mother Devaki Devi along with their three kids(2 sons-Mahendra Singh Dhoni & Narendra, 1 daughter- Jayanti) moved to Ranchi from Lvalli (his paternal village) located in Uttarakhand where his father worked at junior management levels in MECON.
Dhoni has done his schooling from DAV Jawahar Vidya Mandir, Shyamali (now the school is known as JVM, Shyamli, Ranchi). Before he stepped into cricketing career, he excelled in badminton and football and got selected at district as well club level in these two sports. MS Dhoni played as a goalkeeper for his football team in those days and was sent to play cricket for a cricket club that was local by his football coach.
He made his cricketingdebut ina cricket team of Bihar in Jharkhand during the 1998-1999 cricketseasons as an eighteen year old.Subsequently, he was chosen to represent India-A for a cricket tour to Kenya in 2004.Apart from being one of the most successful captains of the Indian cricket team till now;he is a wicketkeeper, right hand batsman as well as right hand medium paced bowler.
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